ईश्वरीय कर्तव्य के रूप में रोज़ा वास्तव में लोगों के लिए एक ख़ास नेमत है, इसका उद्देश्य इंसान का आध्यात्मिक उत्थान है और यह अन्य उम्मतों पर भी वाजिब किया गया था। रोज़ा रखने से रूह पाकीज़ा और आत्मा शुद्ध होती है, व्यक्तिगत और सामाजिक पवित्रता का उत्थान होता है, कठिनाइयों के मुक़ाबले में इच्छाशक्ति मज़बूत होती है। इसके अलावा इंसान के स्वास्थ्य पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट है, और ईश्वर ने रोज़ेदारों के लिए महान पुण्य निर्धारित किया है। रोज़ा इस्लामी शरीयत के मूल सिद्धांतों में से एक है तथा रमज़ान के महीने में रोज़ा छोड़ना जायज़ नहीं है, लेकिन अगर किसी शख़्स को यह विश्वास हो जाए कि रोज़ा रखने से वह बीमार हो जाएगा, या उसकी बीमारी बढ़ जाएगी और स्वस्थ होने में देरी होगी तो ऐसी हालत में रोज़ा छोड़ सकता है, लेकिन बाद में वह उसकी क़ज़ा रखेगा, यानी जो रोज़े छूट गए हैं उनके बदले में रोज़ा रखेगा।
स्पष्ट है कि अगर ईमानदार विशेषज्ञ व डॉक्टर के दिशा-निर्देशों के कारण भी यह विश्वास प्राप्त हो रहा है तो यह पर्याप्त है। इसलिए जिन बातों का ऊपर ज़िक्र किया गया है, उन्हें लेकर अगर किसी को डर या चिंता हो और यह तर्कसंगत भी हो तो रोज़ा रखना वाजिब नहीं है, हां उसकी क़ज़ा करना वाजिब है।
ग़ौरतलब है कि 25 या 26 अप्रैल से रमज़ान का महीना शुरू हो रहा है और मुसलमान इस महीने में रोज़ा रखने के साथ ही विशेष इबादतें करते हैं, लेकिन इस साल कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण और उससे बचने के लिए विशेषज्ञों के विशेष दिशा-निर्देशों ने कुछ लोगों को चिंतित कर दिया है।
ईरान में कोरोना वायरस के प्रसार की रोकथाम के लिए मस्जिदों और धार्मिक स्थलों को बंद कर दिया गया था। सरकार ने इस प्रतिबंध को अगले दो हफ़्तों के लिए बढ़ा दिया है।